रहबर साहब ने एक नज़्म लिखी, जिसे जगजीत साहब ने कुछ इस तरह गाया है, कि लगता है जैसे हर शब्द सीधे आत्मा तक पहुँच रहा हो.... कभी नितांत एकाकीपन में इसको सुनता हूँ तो अक्सर पलकें नम हो जाति हैं....
इस नज़्म को सुनते वक्त मेरा एक पुराना मित्र पैग बनाते हुए अक्सर ऐसा कहता है......
यार भानु, उसके लिखे खत जला तो देता लेकिन जगजीत साहब और रहबर साहब आड़े आते रहे... “तेरे खुशबू में बसे खत में जलाता कैसे... १० वीं से आज तक, शायद हज़ारों बार इस नज़्म को सुन चुका हूँ.. हर बार बेचैन हो, कमजोर पड़ जाता हूँ. पिछली दफा जब उनको पढ़ा तो हाथ कांपने लगे थे.. जैसे तैसे कांपते हाथों ने उनको वापस रखा था. पर उस खुशबू से आज भी परेशान हूँ जो उन्हें पढते हुए मुझे महशूस हुई थी. जब सुनता हूँ..”मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह” तो अक्सर आँखें भर जाती हैं क्योंकि अरसे से मैंने उन्हें पढ़ा नहीं.
उसने जाते वक्त एक ब्रीफकेस दिया था. उसी में सभी खतों को रख दिया था. इसी नज़्म को सुनते हुए, एक रात कांपते हाथों ने उस ब्रीफकेस को अलमारी में ये सोच कर रखा था कि किसी दिन इनको गंगा में बहा आऊंगा.....
अभी नज़्म का एक हिस्सा फिर कुरेद गया. “जिनको एक उम्र कलेजे से लगाए रखा”.. तो याद आया की १२ वीं करने के बाद जब कानपुर में IIT-JEE की तैयारी कर रहा था तब हर रात सारे खतों को एक बार पढकर ही सोता था. सारी रात उनकी खुशबू चादर की सलवटों में रहती थी.. बहुत अच्छी नींद आती थी.
इस गज़ल को बार बार सुनता हूँ ताकि इतना ध्यान रख सकूँ कि एक दिन फुर्सत निकाल अपने गांव जाऊँगा. फर्रुखाबाद, वहां से गंगा पास में ही है. तो इन सभी खतों को गंगा में बहाकर आऊंगा.
मैं इनको जला तो नहीं सकता पर गंगा में बहाकर अपने मन को जरूर संभाल लूँगा. अपने मन को कहूँगा कि ये गंगा तो बहुत पवित्र है, यार... तो शायद मन संभल जाए.
पर एक बात तो पक्की है. जब आखिरी बार उनको गंगा में बहाने के लिए निकालूँगा, तो वो बह तो जायेंगे... पर मेरे हाथों में ही खुशबु छोड जायेंगे... वो खुशबु उस दिन तक रहेगी, जब तक मैं खुद नहीं जल जाऊँगा....
Thursday, March 25, 2010
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